आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता: पहलगाम की त्रासदी और भारत की इंसानियत

आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता: पहलगाम की त्रासदी और भारत की इंसानियत

निर्मल कुमार

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकवादी हमला न केवल एक भयावह त्रासदी है, बल्कि मानवता के खिलाफ किया गया एक गहन अपराध भी है। इस हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई और 20 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। आतंकियों ने सेना की वर्दी पहनकर हिन्दू तीर्थयात्रियों को निशाना बनाया और पीड़ितों की पहचान धर्म पूछकर की। यह घटना केवल एक समुदाय पर हमला नहीं थी, बल्कि पूरे भारत की साझा संस्कृति, भाईचारे और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर किया गया प्रहार थी।इस कायराना हरकत ने न केवल भारत की एकता को चुनौती दी, बल्कि इस्लाम जैसे शांतिप्रिय धर्म की भी गलत तस्वीर प्रस्तुत की। यह समझना बेहद आवश्यक है कि आतंकवादियों की इस नृशंसता का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। क़ुरान स्पष्ट रूप से कहता है —“जो लोग तुमसे लड़ते हैं, उनसे तुम भी अल्लाह की राह में लड़ो, लेकिन ज़्यादती मत करो, निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता” (क़ुरान 2:190)।इस्लाम में निर्दोषों की हत्या को सबसे बड़ा गुनाह माना गया है — चाहे वो हिन्दू हो, मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी भी अन्य धर्म के अनुयायी।भारत में 17 करोड़ से अधिक मुस्लिम नागरिक रहते हैं — वे कोई बाहरी नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्होंने बार-बार आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई है, भाईचारे को बढ़ावा दिया है और राष्ट्रभक्ति की मिसाल पेश की है। पहलगाम हमले के दौरान कश्मीरी मुसलमानों का व्यवहार इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब गोलियों की गूंज और चीख-पुकार के बीच आतंकियों ने धर्म देखकर लोगों की जान ली, तब कई स्थानीय मुसलमान युवकों ने अपनी जान की परवाह किए बिना घायल तीर्थयात्रियों की मदद की।घायलों को उठाकर अस्पताल पहुँचाने से लेकर, रक्तदान करने और उन्हें ढाढ़स बंधाने तक, हर कदम पर उन्होंने दिखा दिया कि इंसानियत किसी मज़हब की मोहताज नहीं होती। कुछ मामलों में तो स्थानीय लोगों ने अपने घरों को अस्थायी चिकित्सा केंद्र बना दिया, ताकि समय पर उपचार मिल सके। उन्होंने साबित किया कि कश्मीर का दिल अमन के लिए धड़कता है, और असली कश्मीरी आतिथ्य कभी मर नहीं सकता।देश की प्रमुख मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं और नेताओं ने भी इस आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की है। ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी ने देश भर की 5.5 लाख मस्जिदों में आतंकवाद के खिलाफ विशेष दुआओं की अपील की और साफ कहा कि जो निर्दोषों की हत्या करते हैं, उन्हें भारत की धरती पर दफनाने का कोई हक नहीं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अर्शद मदनी ने इन आतंकियों को “दरिंदे” कहा, जबकि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के प्रमुख सैयद सादतुल्लाह हुसैनी ने पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने की मांग की।हमारे संविधान की आत्मा धर्मनिरपेक्षता है, और भारत की असली ताक़त इसकी विविधता में निहित है। यह ज़रूरी है कि हम इस घटना को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के नजरिए से न देखें। आतंकवाद न किसी धर्म को मानता है, न किसी राष्ट्र को। जो लोग निहत्थे लोगों की हत्या करते हैं, उनकी तुलना किसी धर्म के अनुयायियों से करना सरासर नाइंसाफी है।क़ुरान की आयतें आतंकियों के दावों को सिरे से खारिज करती हैं:“धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है” (क़ुरान 2:256)और“दुश्मनी के बावजूद भी इंसाफ करो, यही अल्लाह का तक़वा है” (क़ुरान 5:8)।आज जब कुछ तत्व नफरत फैलाकर देश को बांटना चाहते हैं, तब भारत के नागरिकों को पहले से कहीं ज़्यादा एकजुट होने की आवश्यकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कुछ आतंकवादियों की कायरता के कारण करोड़ों भारतीय मुस्लिमों को शक की नजर से न देखा जाए। हमें ये समझना होगा कि आतंकवादियों की कोई कौम नहीं होती, उनका कोई धर्म नहीं होता — वे केवल हत्यारे होते हैं।हमारा जवाब नफरत नहीं, इंसानियत होनी चाहिए। पहलगाम का रक्तपात हमें डराने के लिए था, लेकिन हमें और मज़बूती से यह दिखाना होगा कि भारत न झुकता है, न बंटता है। हर वह भारतीय जो अमन, इंसाफ और भाईचारे में विश्वास करता है — वही सच्चा देशभक्त है।भारत की आत्मा एक है, और आतंकवाद उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पहलगाम के घाव अभी भरे नहीं हैं, लेकिन वहां दिखी इंसानियत की रोशनी हमें अंधेरे से बाहर निकालने की ताक़त देती है। इस मुश्किल घड़ी में यह आवश्यक है कि हम धर्म के नाम पर किसी भी नफरत को अपने बीच जगह न दें।हम सभी को यह याद रखना होगा: आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।

समसामयिक लेख, निर्मल कुमार

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